
सुगतिं दुर्गतिं प्राप्त: स्वीकरोति कलेवरम् ।
तत्रेन्द्रियाणि जायन्ते गृह्णाति विषयांस्तत: ॥178॥
अन्वयार्थ : सुगतिं दुर्गतिं प्राप्त: कलेवरं स्वीकरोति । तत्र इन्द्रियाणि जायन्ते, तत: विषयान् गृह्णाति ।
देव-मनुष्यरूप सुगति और नरक-तिर्यंचरूप-दुर्गति को प्राप्त हुआ जीव उस-उस गतियोग्य शरीर को ग्रहण करता है । उस शरीर में यथायोग्य इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं और उन इंद्रियों से स्पर्शादि विषयों को ग्रहण करता है ।