+ मुक्ति का कारण - -
दु:खतो बिभ्यता त्याज्या: कषाया: ज्ञान-शालिना ।
ततो दुरित-विच्छेदस्ततो निर्वृति-संगम: ॥180॥
अन्वयार्थ : दु:खत: बिभ्यता ज्ञान-शालिना कषाया: त्याज्या: (सन्ति) । तत: दुरित-विच्छेद: (भवति) । तत: निर्वृति-संगम: (जायते)
इसलिए दुःख से भयभीत ज्ञानवान जीव को मिथ्यात्व, कषायादि का त्याग करना चाहिए । मिथ्यात्वादि के त्याग से पुण्य-पापरूप दुःखद कर्मों का नाश होता है और कर्मों के विनाश से सहज ही मुक्ति की प्राप्ति होती है ।