
ततो भवन्ति रागाद्यास्तेभ्यो दुरित-संग्रह: ।
तस्माद् भ्रमति संसारे ततो दु:खमनेकधा ॥179॥
अन्वयार्थ : तत: रागाद्या: भवन्ति । तेभ्य: दुरित-संग्रह: । तस्मात् संसारे भ्रमति । तत: अनेकधा-दु:खं ।
प्राप्त इंद्रियों से विषय-ग्रहण के कारण राग-द्वेषादिक उत्पन्न होते हैं । रागादिक से पुण्य-पापरूप दुःखद कर्मों का संचय-अर्थात् बन्ध होता है और उस कर्म-बन्ध के कारण अनेक प्रकार का दुःख प्राप्त होता है ।