+ पुण्य-पाप के कारण का परिचय - -
प्रशस्तो भण्यते तत्र पुण्यं पापं पुन: पर: ।
द्वयं पौद्गलिकं मूर्तं सुख-दु:ख-वितारकम् ॥182॥
अन्वयार्थ : तत्र प्रशस्त: पुण्यं, पुन: पर: पापं भण्यते । द्वयं पौद्गलिकं, मूर्तं, सुख-दु:ख-वितारकं (च भवति)
उन दो प्रकार के परिणामों में प्रशस्त परिणाम को पुण्य और अप्रशस्त परिणाम को पाप कहते हैं । ये दोनों पुण्य-पापरूप परिणाम पौद्गलिक हैं, मूर्तिक हैं और क्रमशः सांसारिक सुख दुःख के दाता हैं ।