
मूर्तो भवति भुञ्जान: सुख-दु:खफलं तयो: ।
मूर्तकर्मफलं मूर्तं नामूर्तेन हि भुज्यते ॥183॥
अन्वयार्थ : तयो: सुख-दु:ख-फलं भुञ्जान: मूर्त: भवति; मूर्त-कर्म-फलं मूर्तं अमूर्तेन न हि भुज्यते ।
उन दोनों पुण्य-पापरूप परिणामों के सुख-दुःखरूप फल को भोगता हुआ यह जीव मूर्तिक होता है; क्योंकि मूर्तिक कर्म का फल मूर्तिक होता है और वह अमूर्तिक द्वारा नहीं भोगा जाता ।