
कल्मषागमनद्वार-निरोध: संवरो मत: ।
भाव-द्रव्यविभेदेन द्विविध: कृतसंवरै: ॥191॥
अन्वयार्थ : कृतसंवरै: कल्मष-आगमन-द्वार-निरोध: संवर: भाव-द्रव्य-विभेदेन द्विविध: मतः ।
अपने जीवन में संवर व्यक्त करनेवाले अरहन्तों ने मिथ्यात्वरूप पाप के आगमन के निरोध/रोकने को संवर कहा है । संवर के दो भेद हैं - १. भावसंवर २. द्रव्यसंवर ।