
विषय-सुखतो व्यावृत्य स्व-स्वरूपमवस्थितस्त्य ।
जति धिषणां धर्माधर्म-प्रबन्ध-निबन्धिनीम् ॥
जनन-गहने दु:खव्याघ्रे प्रवेशपटीयसीं । ।
कलिल-विकलं लब्ध्वात्मानं स गच्छति निर्वृत्तिम् ॥190॥
अन्वयार्थ : विषय-सुखत: व्यावृत्य स्व-स्वरूपं अवस्थित: धर्म-अधर्म-प्रबन्ध-निबन्धिनीं दु:ख-व्याघ्रे जनन-गहने प्रवेश-पटीयसीं धिषणां त्यजति स: कलिल-विकलं आत्मानं लब्ध्वा निर्वृतिं गच्छति ।
जो योगी विषय-सुख से निवृत्त होकर अपने आत्मस्वरूप में अवस्थित होते हैं और धर्माधर्मरूप पुण्य-पाप के बन्ध की कारणभूत उस बुद्धि का त्याग करते हैं, जो बुद्धि दुःखमय व्याघ्र से व्याप्त गहन संसार-वन में प्रवेश करानेवाली है, वे कर्मरहित विविक्त अर्थात् शुद्ध आत्मा को पाकर मुक्ति को प्राप्त होते हैं ।