
ज्ञान-दृष्टि-चरित्राणि ह्रियन्ते नाक्षगोचरै: ।
क्रियन्ते न च गुर्वाद्यै: सेव्यमानैरनारतम् ॥208॥
उत्पद्यन्ते विनश्यन्ति जीवस्य परिणामिन: ।
तत: स्वयं स दाता न, परतो न कदाचन ॥209॥
अन्वयार्थ : ज्ञान-दृष्टि-चारित्राणि अक्षगौचरै: न ह्रियन्ते च अनारतं सेव्यमानै: गुर्वाद्यै: न क्रियन्ते । परिणामिन: जीवस्य तानि उत्पद्यन्ते विनश्यन्ति । तत: स: कदाचन स्वयं दाता न । न परत: ।
इंद्रियों के विषयों को भोगने से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्ररूप पर्यायों का हरन नहीं होता । निरन्तर जिनकी सेवा की गई है ऐसे सच्चे गुरु भी अपने शिष्य में सम्यग्दर्शनादि पर्यायों को उत्पन्न नहीं कर सकते । परिणमनशील जीव की ये सम्यग्दर्शनादि पर्यायें स्वयं से उत्पन्न होती हैं और स्वयं विनाश को प्राप्त होती हैं । इसलिए जीव द्रव्य भी इन सम्यग्दर्शनादि पर्यायों का दाता नहीं है और न कोई परद्रव्य ।