+ व्यवहारनय से शरीरादि आत्मा के कहे जाते हैं, निश्चयनय से नहीं - -
शरीरमिन्द्रियं द्रव्यं विषयो विभवो विभु: ।
ममेति व्यवहारेण भण्यते न च तत्त्वत: ॥210॥
अन्वयार्थ : शरीरं, इन्द्रियं, द्रव्यं, विषय:, विभव: च विभु: मम (अस्ति) इति व्यवहारेण भण्यते तत्त्वत: न (भण्यते)
औदारिकादि शरीर, स्पर्शनेन्द्रियादि इन्द्रियाँ, धनादिद्रव्य, स्पर्शादि इन्द्रियों के विषय, अनेक प्रकार का लौकिक वैभव, स्वामी आदि मेरे हैं; ऐसा व्यवहारनय से कहा जाता है; किन्तु तात्त्विक दृष्टि (निश्चयनय) से शरीरादि मेरे (आत्मा के) नहीं हैं ।