+ पर्याय-अपेक्षा से कर्मफल भोगने का स्वरूप - -
विदधाति परो जीव: किंचित्कर्म शुभाशुभम् ।
पर्यायापेक्षया भुक्ते फलं तस्य पुन: पर: ॥213॥
अन्वयार्थ : पर्याय-अपेक्षया पर: (एक:) जीव: किंचित् शुभ-अशुभं कर्म विदधाति पुन: परः (अन्य: जीव:) तस्य फलं भुक्ते ।
पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से अन्य जीव कुछ शुभ-अशुभ कर्म करता है और उसका फल अन्य जीव भोगता है ।