
इष्टोऽपि मोहतोऽनिष्टो भावोऽनिष्टस्तथा पर: ।
न द्रव्यं तत्त्वत: किंचिदिष्टानिष्टं हि विद्यते ॥226॥
अन्वयार्थ : मोहत: इष्ट: भाव: अपि अनिष्ट: तथा अनिष्ट: पर: मन्यते । तत्त्वत: किंचित् द्रव्यं इष्ट-अनिष्टं न हि विद्यते ।
मोह के कारण इष्ट मानता था, उसी वस्तु को अनिष्ट मानने लगता है और जिस वस्तु को पहले अनिष्ट मानता था, उसी वस्तु को इष्ट मानने लगता है । वास्तव में संसार में कोई भी वस्तु इष्ट या अनिष्ट नहीं है ।