
रत्नत्रये स्वयं जीव: पावने परिवर्तते ।
निसर्गनिर्मलः शङ्ख: शुक्लत्वे केन वर्त्यते ॥227॥
अन्वयार्थ : निसर्ग-निर्मल: शङ्ख: शुक्लत्वे केन वर्त्यते ? जीव: पावने रत्नत्रये स्वयं परिवर्तते ।
जैसे स्वभाव से निर्मल शंख स्वयं अपने स्वभाव से ही शुक्लता में परिवर्तित होता है, अन्य किसी से नहीं; वैसे जीव पवित्र रत्नत्रय की आराधना में स्वयं प्रवृत्त होता है; अन्य किसी से नहीं ।