+ मोह का त्यागी साधक ही कर्मों का संवर करता है - -
इत्थं विज्ञाय यो मोहं दु:खबीजं विमुञ्चति ।
सोऽ न्यद्रव्यपरित्यागी कुरुते कर्म-संवरम् ॥231॥
अन्वयार्थ : इत्थं विज्ञाय य: दु:ख-बीजं मोहं विमुञ्चति; स: अन्य-द्रव्य-परित्यागी कर्म-संवरं कुरुते ।
इसप्रकार मोह को दुःख का बीज जानकर जो साधक मोह को छोड़ता है, वह परद्रव्य का त्यागी होता हुआ कर्मों का संवर करता है अर्थात् कर्मों के आस्रव को रोकता है ।