
निजरूपं पुनर्याति मोहस्य विगमे सति ।
उपाध्यभावतो याति स्फटिक: स्वस्वरूपताम् ॥230॥
अन्वयार्थ : उपाधि-अभावत: स्फटिक: स्वस्वरूपतां याति मोहस्य विगमे सति निजरूपं पुन: याति ।
जिसप्रकार लालपुष्पादिरूप संयोगस्वरूप उपाधि का अभाव हो जाने से स्फटिक अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त होता है; उसीप्रकार मोह का नाश हो जाने पर जीव पुनः अपने निर्मलस्वरूप को प्राप्त होता है ।