
अचेतनं ततः सर्वं परित्याज्यं मुमुक्षुणा ।
चेतनं सर्वदा सेव्यं स्वात्मस्थं संवरार्थिना ॥251॥
अन्वयार्थ : तत: संवरार्थिना मुमुक्षुणा सर्वं अचेतनं परित्याज्यं स्व-आत्मस्थं चेतनं सर्वदा सेव्यं ।
अतः जो मोक्ष का अभिलाषी एवं संवर का अर्थी है, उसके लिये समस्त अचेतन पदार्थ समूह त्यजनीय है और अपना अनादि-अनंत चेतनरूप जीव तत्त्व सदा ही ध्येयरूप से सेवनीय है ।