+ शीघ्र संवर करनेवालों का परिचय - -
आत्मतत्त्वमपहस्तित-रागं ज्ञान-दर्शन-चरित्रमयं य: ।
मुक्तिमार्गवगच्छति योगी संवृणोति दुरितानि स सद्यः ॥252॥
अन्वयार्थ : य: योगी अपहस्तितरागं आत्म-तत्त्वं, च ज्ञान-दर्शन-चारित्रमयं मुक्तिमार्गं (च) अवगच्छति स: सद्य: दुरितानि (कर्माणि) संवृणोति ।
जो योगी (महामुनिराज) राग-रहित (वीतरागस्वभावी) त्रिकाली निज शुद्ध आत्मतत्त्वरूप द्रव्य को और सम्यक्ज्ञान-दर्शन-चारित्ररूप मोक्षमार्ग (स्वरूप पर्याय) को जानते (पहिचानते) हैं, वे कर्मों का शीघ्र (पूर्ण) संवर करते हैं ।