+ दोनों निर्जरा का स्वरूप - -
प्रक्षयः पाकजातायां पक्वस्यैव प्रजायते ।
निर्जरायामपक्वायां पक्वापक्वस्य कर्मणः ॥254॥
अन्वयार्थ : पाकजातायां पक्वस्य एव (कर्मण:) प्रक्षय: जायते । अपक्वायां निर्जरायां पक्व-अपक्वस्य कर्मण: (प्रक्षय: प्रजायते)
पाकजा निर्जरा में पके हुए (उदय काल को प्राप्त) ज्ञानावरणादि आठों कर्मों का विनाश होता है । अपाकजा निर्जरा में पके-अपके (काल प्राप्त-अकालप्राप्त दोनों प्रकार के) ज्ञानावरणादि आठों कर्मों का विनाश होता है ।