+ संवर के बिना निर्जरा नहीं - -
संवरेण बिना साधोर्नास्ति पातकनिर्जरा ।
नूतनाम्भ:प्रवेशोऽस्ति सरसो रिक्तता कुतः ॥258॥
अन्वयार्थ : (यथा) नूतन-अम्भ:प्रवेश: अस्ति (तर्हि) सरस: रिक्तता कुत: (जायते) ? (तथा) संवरेण बिना साधो: (कर्मणां) पातक-निर्जरा न अस्ति ।
जैसे सरोवर में नये जल के प्रवेश को रोके बिना सरोवर को जल से रहित नहीं किया जा सकता, वैसे ही (मिथ्यात्वादि के) संवर के बिना साधु के पाप कर्मों की अपाकजा (अविपाक) निर्जरा नहीं हो सकती ।