+ एकाग्र चित्त साधु ही कर्मों के नाशक - -
रत्नत्रयमयं ध्यानमात्मरूपप्ररूपकम् ।
अनन्यगतचित्तस्य विधत्ते कर्मसंक्षयम् ॥259॥
अन्वयार्थ : अनन्यगतचित्तस्य (योगिन:) आत्मरूप-प्ररूपकं रत्नत्रयमयं ध्यानं कर्म-सक्षयं विधत्ते ।
अनन्य चित्तवृत्ति के धारक (एकाग्रचित्तवृत्तिवाले मुनिराज) का आत्मस्वरूप का प्रतिपादक रत्नत्रयमयी ध्यान कर्मों का विनाश करता है ।