+ लोकाचार अपनाने से संयम हीन होता है - -
हित्वा लोकोत्तराचारं लोकाचारमुपैति यः ।
संयमो हीयते तस्य निर्जरायां निबन्धनम् ॥265॥
अन्वयार्थ : य: (योगी) लोकोत्तरं आचारं हित्वा लोकाचारं उपैति; तस्य निर्जरायां निबन्धनं संयम: हीयते ।
जो मुनिराज लोकोत्तर आचार (अलौकिक वृत्ति) को छोड़कर लोकाचार (लोकरंजक / लौकिक) आचरण को अपनाते हैं, उनका निर्जरा का कारणरूप संयम हीन हो जाता है ।