
अन्याचारपरावृत्तः स्वतत्त्वचरणादृतः ।
संपूर्णसंयमो योगी विधुनोति रजः स्वयम् ॥264॥
अन्वयार्थ : अन्य-आचार-परावृत्त: स्व-तत्त्व-चरणादृत: सम्पूर्ण-संयम: योगी स्वयं रज: विधुनोति ।
शुभाशुभरूप अन्य आचरण से सर्वथा विमुख, स्वतत्त्व में आचरण करने में सावधान एवं उत्साही, परिपूर्ण संयमी योगिराज स्वयं कर्मरूपी रज को विशेष रीति से धो डालते हैं ।