
विचित्रे चरणाचारे वर्तमानोऽपि संयतः ।
जिनागममजानानः सदृशो गतचक्षुषः ॥267॥
अन्वयार्थ : विचित्रे चरणाचारे वर्तमान: अपि जिनागमं अजानान: संयत: गतचक्षुष: सदृश: ।
अनेक प्रकार के आचरण में प्रवर्तमान होते हुए भी जो संयमी जिनागम को नहीं जानता, वह चक्षुहीन के समान हैं ।