
अज्ञानी बध्यते यत्र सेव्यमानेऽक्षगोचरे ।
तत्रैव मुच्यते ज्ञानी पश्यताश्चर्यीदृशम् ॥270॥
अन्वयार्थ : अक्षगोचरे सेव्यमाने यत्र अज्ञानी बध्यते तत्र एव ज्ञानी मुच्यते ईदृशं आश्चर्यं पश्यत ।
स्पर्शादि इंद्रिय-विषयों के सेवन करने पर जहाँ अज्ञानी कर्म-बन्ध को प्राप्त होते हैं, वहाँ ज्ञानी उसी स्पर्शादि इंद्रिय-विषय के सेवन से कर्म-बन्धन से छूटते हैं , इस आश्चर्य को देखो ।