+ निर्विकल्प अर्थात् वीतरागता से निर्जरा - -
शुभाशुभ-विकल्पेन कर्मायाति शुभाशुभम् ।
भुज्यमानेऽ खिले द्रव्ये निर्विकल्पस्य निर्जरा ॥271॥
अन्वयार्थ : शुभ-अशुभ-विकल्पेन शुभ-अशुभं कर्म आयाति । अखिले द्रव्ये भुज्यमाने (अपि) निर्विकल्पस्य निर्जरा (जायते)
अज्ञानी (मिथ्यादृष्टि) को शुभाशुभ विकल्प द्वारा (राग-द्वेष के कारण) पुण्य-पापरूप कर्म का आस्रव-बंध होता है । सम्पूर्ण द्रव्य समूह (स्पर्शादि सर्व विषयों को) भोगते हुए भी जो निर्विकल्प (कथंचित् वीतरागी) है, उसको कर्म की निर्जरा होती है ।