
यत् पञ्चाभ्यन्तरैः पापैः सेव्यमानः प्रबध्यते ।
न तु पञ्चबहिर्भूतैराश्चर्यं किमतः परम् ॥285॥
अन्वयार्थ : यत् पञ्चाभ्यन्तरै: पापै: सेव्यमान: प्रबध्यते, न तु पञ्चबहिर्भूतै: अत: किम् परम आश्चर्य् ।
जो जीव अन्तरंग में स्थित पाँच पापों से सेव्यमान है वह तो बन्ध को प्राप्त होता है; किन्तु जो बहिर्भूत पाँचों पापों से सेव्यमान है, वह बन्ध को प्राप्त नहीं होता; इससे अधिक आश्चर्य की बात और क्या है?