
स्व-तत्त्वरक्तये नित्यं परद्रव्य-विरक्तये ।
स्वभावो जगतो भाव्यः समस्तमलशुद्धये॥284॥
अन्वयार्थ : नित्यं स्व-तत्त्वरक्तये, परद्रव्य-विरक्तये, समस्तमलशुद्धये जगत: स्वभाव: भाव्य: ।
अनादि-अनंत निज शुद्ध आत्मतत्त्व में लवलीन होने के लिये, द्रव्यों से विरक्त होने की भावना से और मल से रहित होकर शुद्ध होने की इच्छा से जगत के स्वभाव की भावना करना योग्य है ।