+ ज्ञानवान द्रव्य ही वस्तु को जानता है - -
ज्ञानं स्वात्मनि सर्वेण प्रत्यक्षमनुभूयते ।
ज्ञानानुभवहीनस्य नार्थज्ञानं प्रसिद्ध्यति ॥288॥
अन्वयार्थ : सर्वेण स्व-आत्मनि ज्ञानं प्रत्यक्षं अनुभूयते । ज्ञानानुभवहीनस्य अर्थज्ञानं न प्रसिद्ध्यति ।
एकेन्द्रियादि प्रत्येक जीव अपनी आत्मा में विद्यमान ज्ञान गुण के जाननरूप कार्य का अनुभव करता है । जो द्रव्य अपने में ज्ञान न होने से जाननरूप अनुभव से रहित (अचेतन) है, उसे किसी भी द्रव्य का ज्ञान सिद्ध नहीं होता ।