
प्रतीयते परोक्षेण ज्ञानेन विषयो यदि ।
सोऽनेन परकीयेण तदा किं न प्रतीयते ॥289॥
अन्वयार्थ : यदि परोक्षेण ज्ञानेन विषय: प्रतीयते तदा अनेन परकीयेण स: किं न प्रतीयते ?
यदि मति-श्रुतरूप परोक्षज्ञान से स्पर्शादि विषयों का स्पष्ट/प्रत्यक्ष ज्ञान होता है तो इस मति-श्रुतरूप परोक्ष ज्ञान से ही ज्ञानमय आत्मा का स्पष्ट प्रत्यक्ष ज्ञान क्यों नहीं हो सकता? अर्थात् अवश्य हो सकता है ।