
ज्ञेय-लक्ष्येण विज्ञाय स्वरूपं परमात्मन: ।
व्यावृत्त्य लक्ष्यतः शुद्धं ध्यायतो हानिरंहसाम् ॥292॥
अन्वयार्थ : ज्ञेय-लक्ष्येण परमात्मन: स्वरूपं विज्ञाय लक्ष्यत: व्यावृत्त्य शुद्धं ध्यायत: अंहसां हानिः ।
ज्ञेय के लक्ष्य द्वारा परमात्मा के स्वरूप को जानकर और लक्ष्यरूप से व्यावृत होकर शुद्ध स्वरूप का ध्यान करनेवाले के कर्मों का नाश होता है ।