
चट्टुकेन यथा भोज्यं गृहीत्वा स विमुच्यते ।
गोचरेण तथात्मानं विज्ञाय स विमुच्यते ॥293॥
अन्वयार्थ : यथा चट्टुकेन भोज्यं गृहीत्वा स: विमुच्यते तथा गोचरेण आत्मानं विज्ञाय स: विमुच्यते ।
जिस प्रकार कड़छी से भोजन ग्रहण करके उसे को छोड़ दिया जाता है उसी प्रकार गोचर के - ज्ञेय लक्ष्य-द्वारा आत्मा को जानकर ज्ञेय को छोड़ दिया जाता है ।