
धर्मेण वासितो जीवो धर्मे पापे न वर्तते ।
पापेन वासितो नूनं पापे धर्मे न सर्वदा ॥298॥
ज्ञानेन वासितो ज्ञाने नाज्ञानेऽसौ कदाचन ।
यतस्ततो मतिः कार्या ज्ञाने शुद्धिं विधित्सुभिः ॥299॥
अन्वयार्थ : धर्मेण वासित: जीव: नूनं धर्मे वर्तते न पापे, पापेन वासित: सर्वदा पापे न धर्मे । यत: ज्ञानेन वासित: ज्ञाने असौ कदाचन अज्ञाने न; तत: शुद्धिं विधित्सुभि: ज्ञाने मति: कार्या ।
धर्म से संस्कारित हुआ जीव निश्चय से धर्म में सदा प्रवर्तता है, पाप में नहीं । पाप से संस्कारित हुआ जीव निश्चय से सदा पाप में प्रवृत्त होता है, पुण्य में नहीं । ज्ञान से संस्कारित हुआ जीव सदा ज्ञान में प्रवृत्त होता है, अज्ञान में कदाचित् नहीं । इसलिए शुद्धि की इच्छा रखनेवाले को ज्ञान की उपासना में बुद्धि लगाना चाहिए ।