
प्रतिबिम्बं यथादर्शे दृश्यते परसंगतः ।
चेतने निर्मले मोहस्तथा कल्मषसंगतः ॥297॥
अन्वयार्थ : यथा आदर्शे परसंगत: प्रतिबिम्बं दृश्यते तथा निर्मले चेतने कल्मष-संगत: मोह: ।
जिसप्रकार निर्मल दर्पण में पर-द्रव्य के संयोग से प्रतिबिंब दिखता है, स्वभाव से नहीं; उसीप्रकार अनादि-अनंत निर्मल चेतन-द्रव्य में द्रव्य-मोहरूप पापकर्म के उदय से मोह परिणाम दिखता है, स्वभाव से नहीं ।