+ योगी का स्वरूप और उसके जीवन का फल - -
इत्थं योगी व्यपगतपर-द्रव्य-संगप्रसो ।
नीत्वा कामं चपल-करण-ग्राममन्तर्मुखत्वम् । ।
ध्यात्वात्मानं विशदचरण-ज्ञान-दृष्टिस्वभावं, ।
नित्यज्योतिः पदमनुपमं याति निर्जीर्णकर्मा ॥302॥
अन्वयार्थ : इत्थं व्यपगत पर-द्रव्य-संगप्रसंग निर्जीर्णकर्मा योगी कामं चपल-करणग्रामं-अन्तर्मुखत्वं नीत्वा विशदचरण-ज्ञान-दृष्टिस्वभावं आत्मानं ध्यात्वा नित्यज्योति: अनुपमं पदं याति ।
इस प्रकार पर-द्रव्य के संग-प्रसंग से रहित हुए कर्मों की निर्जरा करनेवाले योगी चंचल इन्द्रिय समूह को यथेष्ट (पर्याप्त) अन्तर्मुख करके और विशुद्ध-दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वभावरूप आत्मा का ध्यान करके अनुपम, शाश्वत ज्योतिरूप परमात्म-पद को प्राप्त होते हैं ।