+ मोक्ष का स्वरूप - -
अभावे बन्ध-हेतूनां निर्जरायां च भास्वरः ।
समस्तकर्म-विश्लेषो मोक्षो वाच्योऽपुनर्भवः ॥303॥
अन्वयार्थ : बन्ध-हेतूनां अभावे च निर्जरायां (सत्यां) समस्तकर्म-विश्लेष: भास्वर: अपुनर्भव: वाच्य: मोक्ष:।
नये कर्मबंध के कारणों का सर्वथा अभाव और पूर्व संचित कर्मों की निर्जरा होनेपर आत्मा से संपूर्ण कर्मों का जो विश्लेष अर्थात् पृथक होना, वह प्रकाशमान मोक्ष है, जिसे अपुनर्भव भी कहते हैं ।