+ मलिन आत्मा में केवलज्ञान नहीं - -
न दोषमलिने तत्र प्रादुर्भवति केवलम् ।
आदर्शे न मलग्रस्ते किंचिद् रूपं प्रकाशते ॥305॥
अन्वयार्थ : (यथा) मलग्रस्ते आदर्शें तत्र किंचित् (अपि) रूपं न प्रकाशते तथैव दोषमलिने (आत्मनि) केवलं (ज्ञानं) न प्रादुर्भवति ।
जैसे धूल से धूसरित दर्पण में किसी भी पदार्थ का रूप दिखाई नहीं देता; वैसे ही ज्ञानावरणादि कर्मरूप दोषों से दूषित / मलिन हुए आत्मा में केवलज्ञान प्रगट नहीं होता ।