+ शुद्धात्मध्यान से मोह का नाश - -
न मोह-प्रभृतिच्छेदः शुद्धात्मध्यानतो विना ।
कुलिशेन विना येन भूधरो भिद्यते न हि ॥306॥
अन्वयार्थ : येन कुलिशेन विना भूधर: न हि भिद्यते (तथैव) शुद्धात्मध्यानत: विना मोहप्रभृति-च्छेद: न (भवति)
जिसप्रकार वज्र के बिना पर्वत नहीं भेदा जाता, उसीप्रकार शुद्ध आत्मा के ध्यान के बिना मोहादि कर्मों का छेद अर्थात् नाश नहीं होता ।