
कर्मैव भिद्यते नास्य शुक्ल-ध्यान-नियोगतः ।
नासौ विधीयते कस्य नेदं वचनमञ्चितम् ॥318॥
कर्म-व्यपगमे राग-द्वेषाद्यनुपपत्तितः ।
आत्मनः संगरागाद्याः न नित्यत्वेन संगताः ॥319॥
अन्वयार्थ : अस्य शुक्ल-ध्यान-नियोगत: कर्म एव न भिद्यते । असौ कस्य न विधीयते इदं वचनं न अञ्चितम् । आत्मनः संगरागाद्या: नित्यत्वेन न संगता: , कर्म-व्यपगमे राग-द्वेषादि-अनुपपत्तित: ।
यदि कोई कहे - अरहंत परमात्मा केवलज्ञानी के शुक्लध्यान के नियोग से कर्म सर्वथा भेद को प्राप्त नहीं होते अर्थात् कर्मों का नाश नहीं होता और किसी भी जीव को कभी मोक्ष प्राप्त नहीं होता है; तो यह कथन असत्य है । क्योंकि आत्मा के राग-द्वेष-मोह परिणाम अशाश्वत हैं । कर्मों का विनाश होने पर राग-द्वेषादि की उत्पत्ति ही नहीं होती है ।