+ सिद्ध परमात्मा पुनः संसार में नहीं आते - -
न निर्वृतः सुखीभूतः पुनरायाति संसृतिम् ।
सुखदं हि पदं हित्वा दुःखदं कः प्रपद्यते ॥320॥
अन्वयार्थ : (यथा) हि सुखदं पदं हित्वा दु:खदं (पदं) क: प्रपद्यते ? (क: अपि न; तथा एव) सुखीभूत: निर्वृत: (सिद्ध-परमात्मा) संसृतिं पुन: न आयाति ।
लौकिक जीवन में जिसतरह कोई भी मनुष्य अपनी इच्छा से सुखदायक पद / स्थान को छोड़कर दुःखदायक स्थान का स्वीकार नहीं करता; उसीतरह अव्याबाध अनंत सुखमय सिद्ध स्थान को छोड़कर सिद्ध परमात्मा संसारी नहीं होते ।