
न ज्ञानं प्राकृतो धर्मो मन्तव्यो मान्य-बुद्धिभिः ।
अचेतनस्य न ज्ञानं कदाचन विलोक्यते ॥322॥
अन्वयार्थ : मान्य-बुद्धिभि: ज्ञानं प्राकृत: धर्म: न मन्तव्य: अचेतनस्य ज्ञानं कदाचन न विलोक्यते ।
जो मान्यबुद्धि अर्थात् विवेकशील विद्वान् हैं, उन्हें ज्ञान गुण को प्रकृति अर्थात् जड का धर्म नहीं मानना चाहिए; क्योंकि अचेतन पदार्थ में ज्ञानगुण कभी किसी को प्रत्यक्ष में देखने को नहीं मिलता ।