+ सिद्धात्मा, शरीर ग्रहण नहीं करते - -
शरीरं न स गृह्णाति भूयः कर्म-व्यपायतः ।
कारणस्यात्यये कार्यं न कुत्रापि प्ररोहति ॥321॥
अन्वयार्थ : स: (मुक्तात्मा) कर्म-व्यपायत: भूय: शरीरं न गृह्णाति (यत:) कारणस्य अत्यये कार्यं कुत्र अपि न प्ररोहति ।
अनंत सुखी एवं शरीर रहित मुक्तात्मा ज्ञानावरणादि आठों कर्मों का विनाश हो जाने से पुनः विनाशीक शरीर को ग्रहण नहीं करते; क्योंकि कारण का नाश हो जाने पर कहीं और कभी भी कार्य उत्पन्न नहीं होता ।