
विविधं बहुधा बन्धं बुध्यमानो न मुच्यते ।
कर्म-बद्धो विनोपायं गुप्ति-बद्ध इव ध्रुवम् ॥325॥
अन्वयार्थ : गुप्ति-बद्ध: इव कर्म-बद्ध: विविधं बन्धं बहुधा बुध्यमान: उपायं विना न मुच्यते ध्रुवम् ।
जिसप्रकार कारागृह में पडा हुआ बंदी/कैदी 'मैं कारागृह में कैद हूँ' इसप्रकार मात्र जानने से कारागृह से मुक्त नहीं होता; उसीप्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों से बंधा हुआ संसारी जीव अनेक प्रकार के कर्म-बंधनों को बहुधा / अनेक प्रकार से मात्र जानता हुआ कर्मों से छूटने का वास्तविक उपाय किये बिना मुक्त नहीं होता, यह निश्चित है ।