
संसारी कर्मणा युक्तो मुक्तस्तेन विवर्जितः ।
अशुद्धस्तत्र संसारी मुक्तः शुद्धोऽपुनर्भवः ॥328॥
अन्वयार्थ : कर्मणा युक्त: संसारी, तेन विवर्जित: मुक्त: । तत्र संसारी अशुद्ध: मुक्त: शुद्ध: अपुनर्भव: ।
जो जीव ज्ञानावरणादि आठ कर्मों से सहित हैं, उन्हें संसारी जीव कहते हैं और जो जीव ज्ञानावरणादि आठों कर्मों से रहित हैं, उन्हें मुक्त जीव कहते हैं । इन दोनों में जो संसारी हैं, वे अशुद्ध जीव हैं और जो मुक्त हैं, उन्हें शुद्ध कहते हैं, जिनका नाम अपुनर्भव भी है ।