
भवं वदन्ति संयोगं यतोऽत्रात्म-तदन्ययोः ।
वियोगं तु भवाभावमापुनर्भविकं ततः ॥329॥
अन्वयार्थ : यत: अत्र आत्म-तदन्ययो: संयोगं भवं वदन्ति, वियोगं तु भव-अभावं; तत: आपुनर्भविकं ।
क्योंकि आत्मा तथा आत्मा से भिन्न पुद्गलमय आठों कर्मों के संयोग को भव कहते हैं और आत्मा तथा आत्मा से भिन्न पुद्गलमय आठों कर्मों के वियोग को भवाभाव अर्थात् भव का अभाव/मुक्ति कहते हैं । जीव का पुनः संसार में एकेन्द्रियादि जीवरूप से उत्पन्न न होना अर्थात् जन्म न लेने का नाम भवाभाव है । इसलिए मुक्त/शुद्ध जीव को आपुनर्भविक अर्थात् अपुनर्भववाला कहते हैं ।