+ घाति कर्मों का नाश - -
ऊचिरे ध्यान-मार्गज्ञा ध्यानोद्धूतर जश्चया: ।
भावि-योगि-हितायेदं ध्वान्त-दीपसमं वचः ॥334॥
अन्वयार्थ : ध्यानोद्धूत रजश्चया: ध्यान-मार्गज्ञा: भावि-योगि-हिताय इदं ध्वान्त-दीपसमं वच: रुचिरे ।
ध्यान द्वारा घातिकर्मरूपी रज-समूह को आत्मा से दूर करनेवाले ध्यान-मर्मज्ञ सर्वज्ञ भगवन्तों ने भावी साधक मुनिराजों के लिये अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करनेवाला दीपस्तम्भ समान अगला / ध्यान का उपदेश दिया है ।