
वादानां प्रतिवादानां भाषितारो विनिश्चितम् ।
नैव गच्छन्ति तत्त्वान्तं गतेरिव विलम्बिनः ॥335॥
अन्वयार्थ : गते: विलम्बिन: इव वादानां प्रतिवादानां भाषितार: विनिश्चितं तत्त्वान्तं नैव गच्छन्ति ।
जिसप्रकार चलने में विलंब करनेवाला प्रमादी मनुष्य अपने इच्छित स्थान पर्यंत नहीं पहुँच पाता; उसीप्रकार जो कोई साधक वाद-प्रतिवाद के चक्कर में पडे रहते हैं, वे निश्चित रूप से तत्त्व के अंत को प्राप्त नहीं होते ।