
आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यास-रसेन च ।
त्रेधा विशोधयन् बुद्धिं ध्यानमाप्नोति पावनम् ॥344॥
अन्वयार्थ : आगमेन अनुमानेन ध्यानाभ्यास-रसेन च त्रेधा बुद्धिं विशोधयन् पावनं ध्यानं आप्नोति ।
आगम से, अनुमान ज्ञान से और ध्यानाभ्यासरूप रस से - इन तीन प्रकार की पद्धति से अपनी बुद्धि को विशुद्ध करनेवाला ध्याता / साधक, पवित्र आत्मध्यान को प्राप्त होता है ।