
आत्म-ध्यान-रतिर्ज्ञेयं विद्वत्तायाः परं फलम् ।
अशेष-शास्त्र-शास्तृत्वं संसारोऽभाषि धीधनैः ॥345॥
अन्वयार्थ : विद्वत्ताया: परं फलम् आत्म-ध्यान-रति: ज्ञेयं अशेष-शास्त्र-शास्तृत्वं संसार: धीधनै: अभाषि ।
विद्वत्ता का सर्वोत्तम फल निज शुद्धात्म ध्यान में रति अर्थात् आत्मलीनता ही जानना चाहिए । यदि विद्वत्ता प्राप्त होने पर भी वह विद्वान मनुष्य आत्म-मग्नतारूप कार्य न करे तो संपूर्ण शास्त्रों का शास्त्रीपना अर्थात् जानना भी संसार ही है; ऐसा बुद्धिधनधारकों ने अर्थात् महान विद्वानों ने कहा है ।