+ विद्वानों का संसार - -
संसारः पुत्र-दारादिः पुंसां सूंढचेतसाम् ।
संसारो विदुषां शास्त्रमध्यात्मरहितात्मनाम् ॥346॥
अन्वयार्थ : सूंढचेतसां पुंसां पुत्र-दारादि: (एव) संसार: (अस्ति; तथा) अध्यात्मरहितात्मनां विदुषां शास्त्रं संसार: (अस्ति)
जो मनुष्य स्त्री-पुत्रादिक परद्रव्य में आसक्त होने से अच्छी तरह मूढचित्त अर्थात् अज्ञानी हैं, उनका संसार स्त्री-पुत्रादिक है । जो विद्वान शास्त्रार्थ को जानते हुए भी अध्यात्म से अर्थात् आत्मलीनता से रहित हैं, उनका संसार शास्त्र है ।