
क्षाराम्भस्त्यागतः क्षेत्रे मधुरोऽमृत-योगतः ।
प्ररोहति यथा बीजं ध्यानं तत्त्वश्रुतेस्तथा ॥352॥
अन्वयार्थ : यथा क्षाराम्भस्त्यागत: अमृत-योगत: क्षेत्रे बीजं मधुर: प्ररोहति तथा तत्त्वश्रुते: ध्यानं ।
जिसप्रकार खारे जल के त्याग से और मीठे जल के संयोग से खेत में पडा हुआ बीज मधुर फल को उत्पन्न करता है; उसीप्रकार तत्त्व-श्रवण के संयोग से सम्यग्ध्यान उत्पन्न होता है ।