+ तत्त्व-श्रवण की प्रेरणा - -
क्षाराम्भःसदृशी त्याज्या सर्वदा भोग-शेमुषी ।
मधुराम्भोनिभा ग्राह्या यत्नात्तत्त्वश्रुतिर्बुधैः ॥353॥
अन्वयार्थ : (ध्यान की सिद्धि के लिए) बुधजनों के द्वारा भोगबुद्धि, जो खारे जल के समान है, सदा त्यागने योग्य है और तत्त्वश्रुति, जो कि मधुर जल के समान है, सदा ग्रहण करने योग्य है।